ऐसे शुरु हुआ था इमरोज़ का कविताओं को सिलसिला, पढ़िए उनकी कुछ चुनिंदा कविताएं
इमरोज़ की वे कविताएं... जो थी अमृता को समर्पित
डिजिटल डेस्क। आज हम आपके लिए लेकर इंद्रजीत सिंह की कविता… जिन्हें आप इमरोज़ के नाम से जानते हैं। उनका जन्म 26 जनवरी 1926 को अविभाजित पंजाब के लायलपुर में हुआ था। इंद्रजीत से इमरोज़ बनने का उनका सफ़र तब शुरू हुआ जब अमृता प्रीतम एक स्वतंत्र महिला के रूप में उनके जीवन में आईं। अमृता के बीमार होने के बाद इमरोज़ ने कविताएँ लिखना शुरू कर दिया और उनकी मृत्यु के बाद भी वे ऐसा करते रहे। उनकी कई कविताएँ उन्हें समर्पित थीं।
लोग कह रहे हैं…
लोग कह रहे हैं उसके जाने के बाद
तू उदास और अकेला रह गया होगा
मुझे कभी वक़्त ही नही मिला
ना उदास होने का ना अकेले होने का ..
वह अब भी मिलती है
सुबह बन कर शाम बन कर
और अक्सर नज़मे बन कर
हम कितनी देर एक दूजे को देखते रहे हैं
और मिलकर अपनी अपनी नज़मे ज़िंदगी को सुनाते रहे हैं
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एक ज़माने से
एक ज़माने से
तेरी ज़िंदगी का पेड़ कविता
फूलता फलता और फैलता
तुम्हारे साथ मिल कर देखा है
और जब तेरी ज़िंदगी के पेड़ ने
बीज बनाना शुरू किया
मेरे अंदर जैसे कविता की
पत्तियाँ फूटने लगी हैं
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घोंसला घर
अब ये घोंसला घर चालीस साल का हो चुका है
तुम भी अब उड़ने की तैयारी में हो
इस घोंसला घर का तिनका-तिनका
जैसे तुम्हारे आने पर सदा
तुम्हारा स्वागत करता था
वैसे ही इस उड़ान को
इस जाने को भी
इस घर का तिनका-तिनका
तुम्हें अलविदा कहेगा।
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