डिजिटल डेस्क। साहिर लुधियानवी का असली नाम अब्दुल हयी और तखल्लुस (कलमी नाम) साहिर है। उनका जन्म 8 मार्च 1921 में लुधियाना के एक जागीरदार घराने में हुआ था। साहिर ने कई रचनाएं लिखी हैं, जो लोगों के दिल को छू जाती है। वे एक प्रसिद्ध शायर, गीतकार और कवि थे। साहिर साहब ने कई खूबसूरत कविताएं लिखी हैं, जिनमें से एक है ‘किसी को उदास देख कर‘… पढ़िए
किसी को उदास देख कर
तुम्हें उदास सा पाता हूं मैं कई दिन से
न जाने कौन से सदमे उठा रही हो तुम
वो शोखियां वो तबस्सुम वो कहकहे न रहे
हर एक चीज को हसरत से देखती हो तुम
छुपा के खमोशी में अपनी बेचैनी
खुद अपने राज की तशहीर बन गई हो तुम
मेरी उमीद अगर मिट गई तो मिटने दो
उमीद क्या है बस इक पेश-ओ-पस है कुछ भी नहीं
गम-ए-हयात गम-ए-यक-नफस है कुछ भी नहीं
तुम अपने हुस्न की रानाइयों पे रहम करो
वफा फरेब है तूल-ए-हवस है कुछ भी नहीं
मुझे तुम्हारे तगाफुल से क्यूं शिकायत हो
मेरी फना मेरे एहसास का तकाजा है
मैं जानता हूं कि दुनिया का खौफ है तुम को
मुझे खबर है ये दुनिया अजीब दुनिया है
यहां हयात के पर्दे में मौत पलती है
शिकस्त-ए-साज की आवाज रूह-ए-नग़्मा है
मुझे तुम्हारी जुदाई का कोई रंज नहीं
मेरे खयाल की दुनिया में मेरे पास हो तुम
ये तुम ने ठीक कहा है तुम्हें मिला न करूं
मगर मुझे ये बता दो कि क्यूं उदास हो तुम
खफा न होना मेरी जुरअत-ए-तखातुब पर
तुम्हें खबर है मेरी जिंदगी की आस हो तुम
मेरा तो कुछ भी नहीं है मैं रो के जी लूंगा
मगर खुदा के लिए तुम असीर-ए-गम न रहो
हुआ ही क्या जो जमाने ने तुम को छीन लिया
यहां पे कौन हुआ है किसी का सोचो तो
मुझे कसम है मेरी दुख-भरी जवानी की
मैं खुश हूं मेरी मोहब्बत के फूल ठुकरा दो
मैं अपनी रूह की हर इक खुशी मिटा लूंगा
मगर तुम्हारी मसर्रत मिटा नहीं सकता
मैं खुद को मौत के हाथों में सौंप सकता हूं
मगर ये बार-ए-मसाइब उठा नहीं सकता
तुम्हारे गम के सिवा और भी तो गम हैं मुझे
नजात जिन से मैं इक लहजा पा नहीं सकता
ये ऊंचे ऊंचे मकानों की डेवढ़ियों के तले
हर एक गाम पे भूखे भिखारियों की सदा
हर एक घर में है अफ़्लास और भूख का शोर
हर एक सम्त ये इंसानियत की आह-ओ-बुका
ये कार-खानों में लोहे का शोर-ओ-गुल जिसमें
है दफ़्न लाखों गरीबों की रूह का नग़्मा
ये शाह-राहों पे रंगीन साड़ियों की झलक
ये झोपड़ों में गरीबों के बे-कफन लाशें
ये माल-रोड पे कारों की रेल-पेल का शोर
ये पटरियों पे गरीबों के जर्द-रू बच्चे
गली गली में ये बिकते हुए जवां चेहरे
हुसैन आंखों में अफ्सुर्दगी सी छाई हुई
ये जंग और ये मेरे वतन के शोख जवां
खरीदी जाती हैं उठती जवानियां जिन की
ये बात-बात पे कानून ओ जाब्ते की गिरफ्त
ये जिल्लतें ये गुलामी ये दौर-ए-मजबूरी
ये ग़म बहुत हैं मेरी जिंदगी मिटाने को
उदास रह के मिरे दिल को और रंज न दो



